मंदिर — मुंशी प्रेमचंद

मातृ-प्रेम, तुझे धान्य है ! संसार में और जो कुछ है, मिथ्या है, निस्सार है। मातृ-प्रेम ही सत्य है, अक्षय है, अनश्वर है। तीन दिन से सुखिया के मुँह में …

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अग्नि-समाधि — मुंशी प्रेमचंद

साधु-संतों के सत्संग से बुरे भी अच्छे हो जाते हैं, किन्तु पयाग का दुर्भाग्य था, कि उस पर सत्संग का उल्टा ही असर हुआ। उसे गाँजे, चरस और भंग का …

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हजामत का साबुन — अज्ञेय

दुकान में घुसा तो छोटे लाला नौकर को पीट रहे थे। लाला की दुकान से मैं तब-तब थोड़ा-बहुत सामान लेता रहता हूँ। इसलिए बड़े लाला और छोटे लाला और उनके …

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कलाकार की मुक्ति — अज्ञेय

मैं कोई कहानी नहीं कहता। कहानी कहने का मन भी नहीं होता, और सच पूछो तो कहानी कहना आता भी नहीं है। लेकिन जितना भी अधिक कहानी पढ़ता हूँ या …

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खितीन बाबू — अज्ञेय

वो चेहरे। कौन-से चेहरे? कौन-सा चेहरा? जो जीवन-भर चेहरों की स्मृतियाँ संग्रह करता आया है, उसके लिए यह बहुत कठिन है कि किसी एक चेहरे को अलग निकालकर कह दे …

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वसन्त — अज्ञेय

मधुर कंठवाली एक स्त्री, जो गाती हुई प्रवेश करती है। उसका स्वर आज की सिनेमा आर्टिस्ट का सधा-बँधा स्वर नहीं है। जो ‘प्रीफ़ैब’ सिमेंट की चौरस सिल्ली की तरह नपा-खिंचा …

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साँप — अज्ञेय

अच्छाई-बुराई की बात मैं नहीं जानता। कम-से-कम इतनी नहीं जानता कि सबके, और खासकर अपने, बारे में यह फैसला कर सकूँ कि हम अच्छे हैं कि बुरे। लेकिन उसके बिना …

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नारंगियाँ — अज्ञेय

उस दिन जब मोहल्लेवालों ने देखा कि हरसू ने मोहल्ले के बाहर की नाम को पक्की, पर वास्तव में धूल-भरी सड़क पर पुआल और बोरिये का टुकड़ा बिछाकर उस पर …

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देवीसिंह — अज्ञेय

“बाबूजी, कुछ मैगज़ीन ख़रीदेंगे?” मिस्टर अस्थाना ने उसका सवाल नहीं सुना। सवाल तो दूर, किसी का जवाब सुनना भी उन्हें गवारा नहीं होता। अपनी ही बात उन्हें कितनी प्रिय है, …

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कविप्रिया — अज्ञेय

शान्ता : कवि दिवाकर की पत्नी सुधा, मालती : शान्ता की सहेलियाँ सुरेश : बन्धु, सुधा का पति अशोक : बन्धु दिवाकर : कवि बालक, माली, वेयरा (बँगले के सामने …

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