पहाड़ों को मेरे ऊपर गिरने दो – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

पहाड़ों को मेरे ऊपर गिरने दो नदियों को मुझे बहा ले जाने दो सागर को किनारे पर मुझे बार बार पटकने दो मै अपनी शक्ति की परीक्षा करना चाहता हूँ …

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देह का संगीत – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

मूझे चूमोऔर फूल बना दो मुझे चूमोऔर फल बना दो मुझे चूमोऔर बीज बना दो मुझे चूमोऔर वृक्ष बना दो फिर मेरी छाँह में बैठ रोम रोम जुड़ाओ । मुझे …

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देश काग़ज़ पर बना नक़्शा नहीं होता! – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में आग लगी हो तो क्या तुम दूसरे कमरे में सो सकते हो? यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रहीं हों …

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तुम्हारे हाथो में – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

एक रंग भरी कूची की तरह मैने खुद को तुम्हारे हाथों में दे दिया । तुम उससे अपनी एड़ियां रगड़ सकती होऔर ऐसी भयानक आकृति भीबना सकती हो जिसे देखकर …

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तुम्हारे साथ रहकर – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है कि दिशाएं पास आ गयी हैं, हर रास्ता छोटा हो गया है, दुनिया सिमटकर एक आंगन-सी बन गई है जो खचाखच …

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कितना अच्छा होता है – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

कितना अच्छा होता है एक-दूसरे को बिना जाने पास-पास होना और उस संगीत को सुनना जो धमनियों में बजता है,… उन रंगों में नहा जाना जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं। …

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