Parshuram-ki-pratiksha

परशुराम की प्रतीक्षा (खण्ड-5) — रामधारी सिंह ‘दिनकर’

(१) सिखलायेगा वह, ऋत एक ही अनल है जिन्दगी नहीं वह जहाँ नहीं हलचल है । जिनमें दाहकता नहीं, न तो गर्जन है, सुख की तरंग का जहाँ अन्ध वर्जन …

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परशुराम की प्रतीक्षा (खण्ड-4) — रामधारी सिंह ‘दिनकर’

कुछ पता नहीं, हम कौन बीज बोते हैं, है कौन स्वप्न, हम जिसे यहाँ ढोते हैं। पर, हाँ, वसुधा दानी है, नहीं कृपण है, देता मनुष्य जब भी उसको जल-कण …

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परशुराम की प्रतीक्षा (खण्ड-3) — रामधारी सिंह ‘दिनकर’

किरिचों पर कोई नया स्वप्न ढोते हो? किस नयी फसल के बीज वीर ! बोते हो? दुर्दान्त दस्यु को सेल हूलते हैं हम; यम की दंष्ट्रा से खेल झूलते हैं …

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परशुराम की प्रतीक्षा (खण्ड-2) — रामधारी सिंह ‘दिनकर’

हे वीर बन्धु! दायी है कौन विपद का? हम दोषी किसको कहें तुम्हारे वध का? यह गहन प्रश्न; कैसे रहस्य समझायें? दस-बीस अधिक हों तो हम नाम गिनायें। पर, कदम-कदम …

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परशुराम की प्रतीक्षा (खण्ड-1) — रामधारी सिंह ‘दिनकर’

गरदन पर किसका पाप वीर! ढोते हो? शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो? उनका, जिनमें कारुण्य असीम तरल था, तारुण्य-ताप था नहीं, न रंच गरल था; सस्ती सुकीर्ति पा …

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कृष्ण की चेतावनी — रामधारी सिंह “दिनकर”

महाभारत के ऐतिहासिक युद्ध के पूर्व श्री कृष्ण पांडवों का शान्तिदूत बनकर धृतराष्ट्र की सभा में जाते है। और राजकुमार दुर्योधन को सम्बोधित करते हुये, यह अपेक्षा करते है कि …

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