संकोच-भार को सह न सका — भगवतीचरण वर्मा

संकोच-भार को सह न सका पुलकित प्राणों का कोमल स्वर कह गये मौन असफलताओं को प्रिय आज काँपते हुए अधर । छिप सकी हृदय की आग कहीं ? छिप सका …

पूरा पढ़े

पतझड़ के पीले पत्तों ने — भगवतीचरण वर्मा

पतझड़ के पीले पत्तों ने प्रिय देखा था मधुमास कभी; जो कहलाता है आज रुदन, वह कहलाया था हास कभी; आँखों के मोती बन-बनकर जो टूट चुके हैं अभी-अभी सच …

पूरा पढ़े

बस इतना अब चलना होगा — भगवतीचरण वर्मा

बस इतना अब चलना होगा फिर अपनी-अपनी राह हमें । कल ले आई थी खींच, आज ले चली खींचकर चाह हमें तुम जान न पाईं मुझे, और तुम मेरे लिए …

पूरा पढ़े

मैं कब से ढूँढ़ रहा हूँ — भगवतीचरण वर्मा

मैं कब से ढूँढ़ रहा हूँ अपने प्रकाश की रेखा तम के तट पर अंकित है निःसीम नियति का लेखा देने वाले को अब तक मैं देख नहीं पाया हूँ, …

पूरा पढ़े

देखो-सोचो-समझो — भगवतीचरण वर्मा

देखो, सोचो, समझो, सुनो, गुनो औ’ जानो इसको, उसको, सम्भव हो निज को पहचानो लेकिन अपना चेहरा जैसा है रहने दो, जीवन की धारा में अपने को बहने दो तुम …

पूरा पढ़े

तुम सुधि बन-बनकर बार-बार — भगवतीचरण वर्मा

तुम सुधि बन-बनकर बार-बार क्यों कर जाती हो प्यार मुझे? फिर विस्मृति बन तन्मयता का दे जाती हो उपहार मुझे । मैं करके पीड़ा को विलीन पीड़ा में स्वयं विलीन …

पूरा पढ़े

तुम मृगनयनी — भगवतीचरण वर्मा

तुम मृगनयनी, तुम पिकबयनी तुम छवि की परिणीता-सी, अपनी बेसुध मादकता में भूली-सी, भयभीता सी । तुम उल्लास भरी आई हो तुम आई उच्छ्‌वास भरी, तुम क्या जानो मेरे उर …

पूरा पढ़े

तुम अपनी हो, जग अपना है — भगवतीचरण वर्मा

तुम अपनी हो, जग अपना है किसका किस पर अधिकार प्रिये फिर दुविधा का क्या काम यहाँ इस पार या कि उस पार प्रिये । देखो वियोग की शिशिर रात …

पूरा पढ़े

कल सहसा यह सन्देश मिला — भगवतीचरण वर्मा

कल सहसा यह सन्देश मिला सूने-से युग के बाद मुझे कुछ रोकर, कुछ क्रोधित हो कर तुम कर लेती हो याद मुझे । गिरने की गति में मिलकर गतिमय होकर …

पूरा पढ़े

कुछ सुन लें, कुछ अपनी कह लें — भगवतीचरण वर्मा

कुछ सुन लें, कुछ अपनी कह लें । जीवन-सरिता की लहर-लहर, मिटने को बनती यहाँ प्रिये संयोग क्षणिक, फिर क्या जाने हम कहाँ और तुम कहाँ प्रिये । पल-भर तो …

पूरा पढ़े