हिन्दुस्तान छोड़ दो – इस्मत चुग़ताई

’साहब मर गया जयंतराम ने बाजार से लाए हुए सौदे के साथ यह खबर लाकर दी। ‘साहब- कौन साहब? ‘वह कांटरिया साहब था न? ‘वह काना साहब- जैक्सन। च-च-बेचारा। मैंने …

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लिहाफ – इस्मत चुग़ताई

इस्मत चुगताई जब मैं जाडों में लिहाफ ओढती हूँ तो पास की दीवार पर उसकी परछाई हाथी की तरह झूमती हुई मालूम होती है। और एकदम से मेरा दिमाग बीती …

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भाभी – इस्मत चुग़ताई

भाभी ब्याह कर आई थी तो मुश्किल से पंद्रह बरस की होगी। बढवार भी तो पूरी नहीं हुई थी। भैया की सूरत से ऐसी लरजती थी जैसे कसाई से बकरी। …

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जड़ें – इस्मत चुग़ताई

(उर्दू कहानी : अनुवाद : नन्द किशोर विक्रम) सबके चेहरे उड़े हुए थे। घर में खाना तक न पका था। आज छठा दिन था। बच्चे स्कूल छोड़े, घर में बैठे, …

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चौथी का जोड़ा – इस्मत चुग़ताई

कहानी : इस्मत चुग़ताई सहदरी के चौके पर आज फिर साफ – सुथरी जाजम बिछी थी। टूटी – फूटी खपरैल की झिर्रियों में से धूप के आडे – तिरछे कतले …

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