रवींद्र नाथ टैगोर

Rabindranath-Tagore-jivani-Red-Papers

अमर लेखक एवं साहित्यकार गुरुदेव श्री रवींद्र नाथ टैगोर जी ⁠—

भारतीय साहित्य के रवि, कवियों के कवि आदि नामों से जाने जाने वाले रवींद्र नाथ टैगोर जी जिन्होंने न सिर्फ भारत को राष्ट्रगान के रूप में “जन-गण-मन” जैसी अमूल्य रचना दी बल्कि बांग्लादेश को भी ‘अमार सोनार बांग्ला’ राष्ट्र गान दिया। रवींद्र नाथ जी प्रथम भारतीय साहित्यकार थे जिन्हें उनकी रचना ‘गीतान्जली’ के लिये 1913 में साहित्य का ‘नोबल पुरस्कार’ दिया गया। रवींद्रनाथ जी भारतीय साहित्य में ‘गुरुदेव’ के नाम से विख्यात थे उन्हें यह उपनाम ‘महात्मा गांधी’ द्वारा दिया गया था। रवीन्द्रनाथ जी बचपन से ही प्रतिभावान थे उन्होंने मात्र 6 वर्ष की आयु में पहली कविता लिखी थी। पहली लघु कथा उन्होंने 16 वर्ष की उम्र में लिख ली थी। रवीन्द्रनाथ जी की लेखनी की प्रमुख भाषाएं हिंदी और बांग्ला हुआ करती थी जिसमें उन्होंने 2000 से भी ज्यादा रचनाएं लिखीं थीं। रवीन्द्रनाथ जी उस समय के महान वैज्ञानिक ‘अल्बर्ट आइंस्टीन’ से भी कई बार मिले। अल्बर्ट आइंस्टीन रवीन्द्रनाथ जी को ‘रब्बी टैगोर’ कह कर बुलाते थे। ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें ‘सर’ की उपाधि प्राप्त थी।

रवीन्द्रनाथ टैगोर जी साहित्यकार, कहानीकार, संगीतकार, निबन्धकार, नाटककार एवं चित्रकार आदि रूपों में सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि अन्य पाश्चात्य देशों में भी अत्यधिक प्रसिद्ध थे। उनकी रचनाओं को तमाम पाश्चात्य भाषाओं में भी अनुवाद किया गया।

रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को कलकत्ता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी के एक समृद्ध बंगाली परिवार में हुआ था। पिता ‘देवेंद्र नाथ टैगोर’ ब्रम्ह समाज के वरिष्ठ नेता थे और माँ ‘शारदा देवी’ सरल स्वभाव की घरेलू महिला थी। रवींद्रनाथ जी अपने माता- पिता की  तेरह संतानों में सबसे छोटे थे। अल्प आयु में ही माता का देहांत हो जाने और पिता के अक्सर यात्रा पर रहने के कारण इनका पालन पोषण घर के नौकरों द्वारा किया गया।

टैगोर परिवार बंगाल में नवजागरण के अग्र-स्थान पर था।उनके घर का माहौल किसी विद्यालय से कम नहीं था क्योंकि वहाँ पर पत्रिकाओं का प्रकाशन, थियेटर, बंगाली और पश्चिमी संगीत की प्रस्तुति अक्सर हुआ करती थी।रवींद्रनाथ जी बचपन से ही बहुमुखी प्ररिभा के धनी थे, उनकी प्रारम्भिक शिक्षा कोलकाता में ही सेंट जेवियर नामक स्कूल में हुई।

परन्तु उन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति अधिक पसंद नहीं थी इस कारण उन्हें कक्षा में बैठकर पढना पसंद नहीं था।उनके भाई हेमेंद्रनाथ उन्हें पढाया करते थे। इसके साथ ही वह इन्हें तैराकी, कसरत, जुडो और कुश्ती भी शिखाते थे। इसके साथ ही उन्होंने अलग- अलग विषयों का भी ज्ञान प्राप्त किया।उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज उनका दाखिला कराया गया परन्तु रूचि न होने की वजह से वह वहाँ सिर्फ एक दिन ही गए थे।

उनके पिता रबीन्द्रनाथ जी को भी, बैरिस्टर बनाना चाहते थे। जबकि, उनकी रूचि साहित्य मे थी, रबीन्द्रनाथ जी के पिता ने 1878 मे उनका लंदन के विश्वविद्यालय मे दाखिला कराया परन्तु बैरिस्टर की पढ़ाई मे रूचि न होने के कारण ‘शेक्सपियर’ और कुछ दूसरे साहित्यकारों की रचनाओं का स्व-अध्ययन किया। सन 1880 में बिना लॉ की डिग्री के वह बंगाल वापस लौट आये।

वर्ष 1883 में उनका विवाह ‘मृणालिनी देवी’ से हुआ।रबीन्द्रनाथ अपने पिता के साथ कई महीनों के भारत भ्रमण पर गए। हिमालय स्थित पर्यटन-स्थल डलहौज़ी पहुँचने से पहले वह परिवार के जागीर शान्तिनिकेतन और अमृतसर भी गए। डलहौज़ी में उन्होंने इतिहास, खगोल विज्ञान, आधुनिक विज्ञान, संस्कृत, जीवनी का अध्ययन किया और कालिदास के कविताओं की विवेचना की।

इंग्लैंड से वापस आने और अपनी शादी के बाद से लेकर सन 1901 तक का अधिकांश समय रबीन्द्रनाथ ने सिआल्दा (अब बांग्लादेश में) स्थित अपने परिवार की जागीर में बिताया। वर्ष 1898 में उनके बच्चे और पत्नी भी उनके साथ यहाँ रहने लगे थे। उन्होंने दूर तक फैले अपने जागीर में भ्रमण किया और ग्रामीण और गरीब लोगों के जीवन को बहुत करीब से देखा। वर्ष 1891 से लेकर 1895 तक उन्होंने ग्रामीण बंगाल के पृष्ठभूमि पर आधारित कई लघु कथाएँ लिखीं।

वर्ष 1901 में रबीन्द्रनाथटैगोर ने ‘शान्तिनिकेतन’ की स्थापना की। यहाँ पर उन्होंने एक स्कूल, पुस्तकालय और पूजा स्थल का निर्माण किया। यहीं पर उनकी पत्नी और दो बच्चों की मौत भी हुई। उनके पिता भी सन 1905 में चल बसे।

14 नवम्बर 1913 को रविंद्रनाथ टैगोर जी को उनकी कृति ‘गीतांजली’ के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। अंग्रेजी सरकार ने उन्हें वर्ष 1915 में ‘नाइटहुड’ प्रदान किया। परन्तु रविंद्रनाथ ने 1919 के ‘जलियांवाला बाग़ कांड’ से दुखी होकर ब्रिटिश सरकार का पुरजोर विरोध किया और नाइटहुड भी वापस लौटा दिया।

सन 1921 में कृषि अर्थशाष्त्री ‘लियोनार्ड एमहर्स्ट’ के साथ मिलकर उन्होंने अपने आश्रम के पास ही ‘ग्रामीण पुनर्निर्माण संस्थान’ की स्थापना की। बाद में इसका नाम बदलकर ‘श्रीनिकेतन’ कर दिया गया।अपने जीवन के अंतिम दशक में टैगोर सामाजिक तौर पर बहुत सक्रिय रहे। इस दौरान उन्होंने लगभग 15 गद्य और पद्य कोष लिखे। इस दौरान लिखे गए साहित्य के माध्यम से मानव जीवन के कई पहलुओं को छुआ। उन्होंने विज्ञानं से सम्बंधित लेख भी लिखे।

उन्होंने अपने जीवन के अंतिम 4वर्ष पीड़ा और बीमारी में बिताये। वह जब कभी भी ठीक होते तो कवितायें लिखते थे। इस दौरान लिखी गयीं कविताएं उनकी बेहतरीन कविताओं में से एक हैं। लम्बी बीमारी के बाद 7 अगस्त 1941 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियाँ एवं उपन्यास —

1. भिखारिन 8. काबुलीवाला
2. पिंजर 9. अवगुंठन
3. गूंगी 10. अपरिचिता
4. खोया हुआ मोती 11. अन्तिम प्यार
5. कविऔर कविता 12. अनाथ
6. कंचन 13. अनमोल भेंट
7. आँख की किरकिरी (सम्पूर्ण उपन्यास) – भाग 1 8. आँख की किरकिरी (सम्पूर्ण उपन्यास) – भाग 2
9. आँख की किरकिरी (सम्पूर्ण उपन्यास) – भाग 3 10. आँख की किरकिरी (सम्पूर्ण उपन्यास) – भाग 4
उपन्यास राजर्षि-1887, चोखेरबालि-1903, नौकाडुबि-1906, प्रजापतिरनिर्बन्ध-1908, गोरा-1910, घरेबाइरे-1916, चतुरंग-1916, योगायोग-1929, शेषेरकबिता-1929, मालंच-1934, चारअध्याय-1934
कविताएँ मानसी-1890, सोनारतरी-1894, चित्रा-1896, गीतांजलि-1910, बलाका1916 ,पूरबी-1925, कल्पना-1900, क्षणिका-1900, बलाका-1915, पुनश्च-1932, पत्रपुट-1936

नाटक
प्रकृतिरप्रतिशोध-1884, राजाओराणी-1889, मुक्तधारा-1922, रक्तकरबी-1926, नटीरपूजा-1926, चित्रांगदा-1892 (काब्यनाट्य), बाल्मीकि-प्रतिभा-1881(गीतिनाट्य), मायारखेला-1888(गीतिनाट्य), प्रायश्चित्त-1909, राजा-1910, अचलायतन-1911, डाकघर-1912, चन्डालिका-1933
संस्मरण जीवनस्मृति, छेलेबेला, रूस के पत्र
अन्य रचनाएँ जन-गण-मन (भारत का राष्ट्रगान), अमार सोनार बांग्ला (बांग्ला देश का राष्ट्रगान), रवीन्द्र संगीत
सम्मान साहित्य का नोबल पुरस्कार, ब्रिटिश सरकार द्वारा नाइटहुड की उपाधि
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