अकलंक — अज्ञेय

वे दोनों उस टीले की चोटी पर खड़े थे। चारों ओर काले-काले बादल घिरे हुए थे, धारासार वर्षा हो रही थी, टीले के नीचे घहराता हुआ ह्वांग-हो नदी का प्रवाह था और जहाँ तक दृष्टि जाती थी, पानी-ही-पानी नज़र आता था।

वे दोनों वर्षा की तनिक भी परवाह न करते हुए टीले के शिखर पर खड़े थे।

वह चीनी प्रजातन्त्र सेना की वर्दी पहने हुए था, और भीगता हुआ सावधान मुद्रा में खड़ा था।

स्त्री ने एक बड़ी-सी खाकी बरसाती में अपना शरीर लपेट रखा था। उसके वस्त्राभूषण कुछ भी नहीं दीख पड़ते थे। उसने वेदना-भरे स्वर में कहा, “मार्टिन , तुम्हें भी अपना घर डुबा देना होगा। मेंड़ काट देना, नदी स्वयं भर आएगी।”

मार्टिन कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “क्रिस, क्या इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है?”

स्त्री ने चौंककर कहा, “मार्टिन, यह क्या? सेनापति की जो आज्ञा है, उसका उल्लंघन करोगे?”

“उल्लंघन नहीं। लेकिन अगर बिना शत्रु को आश्रय दिये ही घर बच जाय, तो क्यों न बचा लिया जाय!”

“औरों के भी तो घर थे?”

“वे किसान थे। मैं राष्ट्र का सैनिक हूँ। शायद अपने घर की शत्रु से रक्षा कर सकूँ!”

“मार्टिन, तुम्हें क्या हो गया है? तुम अकेले क्या करोगे? हम सब यहाँ से चले जाएँगे। शत्रु के लिए इतना विशाल भवन छोड़ दोगे, तो हमारे बलिदान का क्या लाभ होगा? हमने अपने घर डुबा दिये हैं, केवल इसीलिए कि शत्रु को आश्रय न मिले। और तुम अपना घर रह जाने दोगे?”

“मेरा घर इतना विशाल है कि उसमें समूचा गाँव आकर रह सकता है।”

“इसीलिए तो उसे डुबाना अधिक आवश्यक है। मार्टिन, सम्पत्ति का इतना मोह!”

मार्टिन को ऐसा प्रतीत हुआ, मानो किसी ने उसे थप्पड़ मार दिया हो। तन कर बोला, “क्रिस, यह मोह नहीं है।” फिर एकाएक पास आकर उसने स्त्री का हाथ पकड़ लिया। “क्रिस, अभी तुम्हें नहीं समझा सकूँगा कि क्या चाहता हूँ; किन्तु विश्वास रखो, मैं जो करना चाहता हूँ, उसी में देश का भला है। तुम इतना विश्वास नहीं करती?” कहकर मार्टिन उसे अपनी ओर खींचने लगा।

स्त्री ने झटककर हाथ छुड़ा लिया और अलग हटकर खड़ी हो गयी। बोली, “तुम अपना, कर्तव्य नहीं कर रहे, मैं तो यही समझ पाती हूँ। सैनिक हो, सेनापति की आज्ञा का उल्लंघन कर रहे हो। इससे अधिक क्या लोभ सोच रहे हो, कौन गुरुतर कर्तव्य, मैं नहीं जानती, न जानना चाहती हूँ।” वह घूमकर टीले से उतर चली।

मार्टिन क्षण-भर तक स्तब्ध रह गया। फिर उसने व्यथित स्वर में पुकारा, “क्रिस्टाबेल! क्रिस्टाबेल!”

किन्तु क्रिस्टाबेल ने मुँह फेरकर देखा भी नहीं।

मार्टिन ने एक लम्बी साँस ली और फिर टीले से दूसरी ओर उतरने लगा। उतरकर वह जल्दी-जल्दी कदम रखता हुआ चला। कोई मील-भर जाकर वह एक बड़े भवन के पास पहुँच गया। उसने दरवाज़े पर से ही आवाज़ दी, “कोई है?”

एक भृत्य आकर सामने खड़ा हो गया। मार्टिन ने तीव्र दृष्टि से उसकी ओर देखकर कहा, “तीन घोड़े ले आओ और पहनने को कपड़े। ज़ीन एक ही घोड़े पर डालना।”

भृत्य ने अत्यन्त विस्मय के स्वर में कहा, “यहीं पर?”

“हाँ, यहीं! फौरन!”

भृत्य भवन के अन्दर गया और कपड़े ले आया। मार्टिन ने कपड़े ले लिये और बोला, “कपड़े मैं स्वयं पहन लूँगा; तुम घोड़े ले आओ!”

भृत्य चुपचाप चला गया। जब वह घोड़े लेकर आया, तब मार्टिन वस्त्र बदल चुका था और घुड़सवारी के उपयुक्त वेश में खड़ा था। घोड़ों के आते ही वह एक पर सवार हो गया और बोला, “मेरी बन्दूक ले आओ।”

भृत्य दौड़कर बन्दूक ले आया। फिर उसने आदर-भाव से पूछा, “कब लौटना होगा?”

मार्टिन ने घोड़े को एड़ लगाते हुए कहा, “तुम्हें इससे मतलब?”

थोड़ी दूर में घुड़सवार, उसका घोड़ा और उसके अनुगामी दोनों घोड़े भी आँखों से ओझल हो गये। भृत्य तब तक वहीं खड़ा उसे देखता रहा, विस्मय का भाव उसके मुख पर उसी भाँति बना रहा।

2

“तुमने सुना? मार्टिन द्रोही है।”

“क्यों?” कैसे? क्या हुआ?”

वर्षा हो रही थी। एक छोटे-से मैदान में बहुत-से स्त्री-पुरुष एकत्र थे। प्रत्येक के पास एक-आध छोटी गठरी थी, जिसमें उन्होंने अपनी ऐहिक सम्पत्ति बाँध रखी थी। किसी-किसी भाग्यशाली के पास एक गधा भी था, जिस पर उसने सामान लाद रखा था। अनेक स्त्रियों को घेरे हुए या उनकी गोद में, छोटे-छोटे बच्चे भी थे। सब-के-सब सर्दी से ठिठुर रहे थे; किन्तु कोई भी इसकी शिकायत नहीं कर रहा था। सबके मन में एक ही भाव था कि अगर हमारे मन में छिपी हुई पीड़ा और अशान्ति व्यक्त हो जाएगी, तो फिर हमारा साहस टूट जाएगा… उस मूक अभिमान के कारण ही वे अब तक बचे हुए थे। उन्हें उस स्थान पर, उस दशा में, एक ही रात काटनी थी, क्योंकि प्रातःकाल ही उन्हें ले जाने के लिए दूसरे गाँव से घोड़े आने वाले थे। फिर भी, वे किसान थे, गरीब थे, अपनी दो हाथ भूमि और दो मुट्ठी अन्न को प्राणों से भी अधिक चाहते थे।

रात के दस बजे चुके थे। कृषक-समूह, जो अब तक प्रतीक्षापूर्ण नेत्रों से मार्टिन के घर की ओर देख रहा था, अब यह समाचार पाकर सिहर उठा।

“क्यों? कैसे? क्या हुआ?”

“तुमने सुना नहीं? उसने कहा है कि मैं सेनापति की आज्ञा मानने को बाध्य नहीं हूँ। जो अच्छा समझूँगा, करूँगा।”

“तुमसे किसने कहा?”

“क्रिस्टाबेल उसे कहने गयी थी, उसी से उसने यह बात कही है। उसके बाद ही वह घर से तीन घोड़े लेकर कहीं चला गया है।”

लोग अब तक थके हुए और उन्मन बैठे थे, अब मानो वेदना की तन्द्रा से जागे और पूछने लगे, “अब क्या होगा?” अनेक मुखों से अनेक प्रकार की आलोचनाएँ होने लगीं।

“होना क्या? द्रोही है तो कोर्ट-मार्शल होगा।”

“द्रोही नहीं, बल्कि कायर है। द्रोह करने के लिए भी हिम्मत चाहिए।”

“कायर को भी कोर्ट-मार्शल से प्राण-दंड मिलेगा।”

“अब तक हम उसे कितना अच्छा समझते थे!”

एक वृद्ध ने, जो अब तक चुपचाप तमाखू चबा रहा था, उसे थूककर कहा, “भई, तुम लोग चाहे जो कहो, मुझे तो उस पर विश्वास है। इतना सीधा, इतना सदय, दूसरों का भला करनेवाला और त्यागी आदमी द्रोही हो सकता है, यह मेरा मन नहीं मानता। तुम्हें याद है, महामारी में उसने कैसे गाँव में रहकर दिन-रात सेवा की थी! कहाँ-कहाँ से डॉक्टर बुलाये थे, दवाइयाँ मँगायी थीं? जिस दिन मेरा लड़का बीमार हुआ,” – कहते-कहते वृद्ध की आँखें डबडबा आयीं – “उस दिन सारी रात वह उसके पास बैठा रहा। मैंने कई बार कहा, अब चले जाओ, सोओ; पर नहीं माना। हमीं से कहता रहा, तुम थके हुए हो, थोड़ा आराम कर लो, कल अच्छा हो जाएगा; पर बेचारे को अच्छा ही नहीं होना था।” कुछ रुककर फिर, “अब तक भी, हमें जिस चीज़ की ज़रूरत होती है, उसी के पास जाते हैं कि नहीं? तुम चाहे जो कहो, मैं तो यही कहूँगा कि उसका नाम जिसने अकलंक रखा, ठीक रखा। वह ईसाई है तो क्या हुआ? मैं तो उसे हमेशा अकलंक कहूँगा।”

एक युवक बोला, “दादा, इतने जोश में न आओ। वह हमारी भलाइयाँ तो करता रहा है; लेकिन क्या इससे उसको कीर्ति नहीं मिलती? और फिर जो भीरु होते हैं, वे प्रायः अच्छे ही जान पड़ते हैं, क्योंकि उनमें बुरा करने की हिम्मत ही नहीं होती!”

विषय ऐसा था कि प्रातःकाल होने तक समाप्त न होता; पर एकाएक कुछ दूर पर एक स्त्री के चीखने का स्वर आया। लोग चौंककर चुप हो गये, दो-तीन ने पुकारकर पूछा, “क्या हुआ?”

किन्तु यह प्रश्न व्यर्थ था, इसका कोई उत्तर भी नहीं मिला। एक विधवा की लड़की पाँच-छः दिन से न्युमोनिया से पीड़ित थी, वह इस घोर शीत को नहीं सह सकी – एक ही हिचकी के झटके से वह इस लोक के बन्धन तोड़कर चली गयी थी। उसी की माता रो रही थी।

लोगों का साहस टूटने के बहुत निकट पहुँच गया। उन्हें एकाएक अपने जीवन की क्षुद्रता और असारता का बोध हो आया। ऐसा प्रतीत होने लगा कि कोई अदृश्य, भैरव और निर्दय अनिष्ट उनके सिर पर मँडरा रहा हो। उस अमानुषी शक्ति की उपस्थिति के ज्ञान से सब एकाएक स्तब्ध होकर एक-दूसरे का मुख देखने लगे; किन्तु कोई किसी से आँख नहीं मिलाता था, मानो इसी आशंका से कि जो भय उनकी आँखों में था, उसी की प्रतिच्छाया दूसरों की आँखों में न दीख जाय!

एकाएक दूर पर घोड़े की टाप सुन पड़ी-कभी भूमि पर पड़ती हुई कठोर टटटप्! टटटप्! टटटप्… फिर कुछ देर के लिए कीच-पानी में छिप्-शश्! छिप्-शश्!

किसी ने कहा, “क्रिस्टाबेल लौट आयी!”

“लेकिन यह तो दो-तीन घोड़ों का स्वर है।”

इस समस्या का हल अपने-आप हो गया। घोड़े उसी मैदान के सिरे पर आकर रुक गये। दो घोड़ों पर बरसाती से बँधे हुए बोझ लदे थे, तीसरे पर सवार था।

सवार ने उस रोती हुई वृद्धा से पूछा, “क्या हुआ?” स्वर मार्टिन का था।

वृद्धा ने कोई उत्तर नहीं दिया, और भी ज़ोर से रोने लगी।

मार्टिन घोड़े पर से उतर पड़ा, देखकर स्थिति समझ गया। सकरुण स्वर से बोला, “माई, तुम मेरे घर चलो न!”

“घर? घर कहाँ है? सब तो डूब गये।”

“मेरा घर बाकी है।”

“तुम कौन हो?”

पास बैठे हुए एक युवक ने तिरस्कारपूर्ण स्वर में ज़ोर से कहा, “ये हैं अकलंक, हमारे गाँव के रक्षक!”

मार्टिन चौंका। एक बार उसने चारों ओर देखा। फिर उसे कुछ याद आया। जिस घोर प्रयास से उसने अपने को वश में किया, उसके लक्षण उसके मुख पर स्पष्ट दीखते थे। फिर वह सबकी ओर उन्मुख होकर बोला, “तुम सब चाहो, तो मेरे घर चलकर रहो। मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा।”

कोई उत्तर नहीं मिला।

मार्टिन फिर कुछ काँपते-से स्वर में बोला, “माई, तुम तो चली चलो। शायद मैं इस लड़की की कुछ दवा-दारू कर सकूँ।”

“जब कोई नहीं जाता, तब मैं भी सब सह लूँगी। लड़की तो अब मर चुकी। मैं कायर नहीं हूँ।’

मार्टिन ने सिर झुका लिया। घोड़े की लगाम पकड़कर धीरे-धीरे आगे चल दिया, कुछ बोल नहीं सका।

पीछे से हँसी की – तिरस्कारपूर्ण हँसी की – ध्वनि आयी। दो-तीन स्वरों ने एक साथ ही कहा, “अकलंक! कायर!”

3

घर के आगे पहुँचकर मार्टिन ने स्वयं ही घोड़ों पर से बोझ उतारा और एक-एक को उठाकर भीतर ले गया। उसके पैरों के शब्द सुनकर जो नौकर देखने आया था, वह चुपचाप खड़ा देखता रहा, उसे इतना साहस भी नहीं हुआ कि आगे बढ़कर सामान उठाने की चेष्टा करे।

मार्टिन ने स्वयं ही उससे कहा – “घोड़ों को ले जाओ।” तब एकाएक बिजली से संजीवित व्यक्ति की तरह वह बाहर दौड़ पड़ा।

मार्टिन ने सब दरवाज़े बन्द कर लिये और कोने में पड़ी हुई कुदाली और फावड़ा निकालकर खोदने लगा। कमरे के मध्य में जब वह काफी बड़ा गड्ढा खोद चुका, तब उसने एक बार कमर सीधी की और फिर घोड़ों पर के दोनों बोझ उसमें डाल दिये। फिर उसने अपनी कमर पर लिपटी हुई बहुत लम्बी एक रस्सी-सी खोली और उसका एक छोर उन गट्ठरों के भीतर रख दिया। इसके बाद उसने गड्ढे को पूर्ववत् भर दिया और वहाँ से किवाड़ तक और किवाड़ के बाहर दूर तक, एक नाली-सी खोदकर उसी में रस्सी दबा दी। जब वह घर से लगभग साठ गज दूर पहुँचा, तब रस्सी समाप्त हो गयी। उसने यहाँ पर उसका सिर बाहर रखकर उस पर कुछ सड़े पत्तों और लकड़ियों का छोटा-सा ढेर लगा दिया। फिर वह घर के भीतर आया और किवाड़ बन्द करके बैठकर न जाने क्या-क्या सोचने लगा।

4

सवेरा नहीं हुआ था। उषा भी नहीं हुई थी; किन्तु फिर भी रात्रि के अन्धकार के रंग में कुछ परिवर्तन हो गया था – वह कुछ भूरा-सा हो गया था। इससे अनुमान किया जा सकता था कि सूर्योदय में कुछ ही देर है। वर्षा अभी होती जा रही थी।

मैदान में बैठे हुए लोग सो नहीं पाये थे। वे अशान्ति और औत्सुक्य से क्रिस्टाबेल की प्रतीक्षा कर रहे थे। क्रिस्टाबेल शाम ही से दूसरे गाँव से घोड़े लाने गयी थी, जो कि उन लोगों को ले जाने वाले थे।

उग्र प्रतीक्षा सदा ही फलीभूत होती है। एकाएक किसी ने चिल्लाकर कहा, “प्रजातन्त्र की जय! क्रिस्टाबेल आ गयी!”

बहुत-से लोग उठ खड़े हुए। क्रिस्टाबेल घोड़े से उतरकर नीचे बैठ गयी और बोली – “मैं कितनी थक गयी हूँ – !” फिर चारों ओर देखकर बोली, “चलो, अब देर क्या है?”

“कुछ नहीं… एक बुढ़िया की लड़की-“

“हाँ, मैंने सुना। वे अभी लौट आएँगे-तुम लोग तैयार हो लो।”

किसी ने पूछा, “और मार्टिन का क्या होगा?”

क्रिस्टाबेल का मुँह लाल हो आया। फिर वह रुककर बोली, “क्यों? उसका क्या होना है?”

“वह तो हमारे विरुद्ध जा रहा है।”

“क्यों?”

“अपना घर बचा रहा है – और कल कुछ रसद भी ले आया है। मालूम होता है, यहीं रहेगा।”

“क्रिस्टाबेल कुछ देर चुप रही। फिर बोली, “तुम लोग चल पड़ो, मैं अभी आती हूँ। मुझे एक नया घोड़ा दे दो।”

दूसरा घोड़ा लेकर वह मार्टिन के घर की ओर चल पड़ी। मैदान में बैठे हुए लोग तत्परता से घोड़े लादने लगे।

मार्टिन अपने घर के बाहर ही टहल रहा था। क्रिस्टाबेल को आते देखकर रुक गया और एकटक उसकी ओर देखने लगा।

क्रिस्टाबेल ने बिना भूमिका के कहा, “मार्टिन, मैं यह क्या सुनती हूँ?”

“यही सुना होगा कि अकलंक अब कलंकी हो गया है!”

क्रिस्टाबेल यह प्रश्न सुनकर सहम गयी और सहसा कुछ कह न सकी। मार्टिन ने स्वयं ही फिर कहा, “क्रिस्टाबेल मैं तुम्हें कह चुका हूँ कि मैं देश का भला सोच रहा हूँ। सारा गाँव मेरे विरुद्ध है, क्या तुम भी मेरा विश्वास नहीं कर सकतीं?”

क्रिस्टाबेल बोली, “मैं क्या करूँ? तुमने मुझे कोई कारण तो बताया नहीं?”

“कारण बताने में विवश हूँ। पर क्या तुम इतना भी विश्वास नहीं कर सकतीं?”

“मैं तो विश्वास करती हूँ, तुम स्वयं ही मुझ से कुछ छिपा रहे हो।”

“अगर कर्तव्य कोई बात छिपाने को कहे-“

“मेरे प्रति तुम्हारा क्या कोई कर्तव्य नहीं है?”

“क्रिस, मुझे अधिक पीड़ित न करो। मैं विवश हूँ, इतना मान लो।”

क्रिस्टाबेल फिर बहुत देर तक चुप रही। फिर एक लम्बी साँस लेकर मुँह फेर कर चल दी।

“कहाँ जा रही हो, क्रिस?”

क्रिस ने दबे हुए उद्वेग के स्वर में उत्तर दिया, “कहीं नहीं, अपना कर्तव्य मुझे भी निश्चित करना है।”

“क्रिस, तुम नाराज हो गयीं-“

“यह प्रेमालाप का समय नहीं है-“

“अगर मैं कारण बता दूँ, तो विश्वास करोगी?”

क्रिस एकाएक ठिठक गयी और बोली, “क्या?”

मार्टिन बहुत देर तक स्थिर दृष्टि से उसके मुख की ओर देखता रहा, कुछ बोला नहीं। फिर, “नहीं, विश्वास मोल नहीं लिया जाता। तुम जाओ!”

मार्टिन के हृदय की उथल-पुथल को क्रिस्टाबेल नहीं समझ पायी। क्रुद्ध सर्पिणी की तरह घूम कर तीव्र गति से चल दी। मार्टिन ने धीरे से कहा, “अविश्वासिनी!”

उसके स्वर में क्रोध की अपेक्षा वेदना ही अधिक थी, इस बात को क्रिस्टाबेल नहीं समझ सकी। उसने क्षण-भर के लिए रुक कर बिना मुख फेरे ही कहा, “कायर!”

जिस समय क्रिस्टाबेल मैदान पर पहुँची, तब लोगों ने देखा, उसकी आँखों में एक अमानुषी तेज था। उसने चुपचाप एक घोड़ा चुना और उछल कर चढ़ गयी। एक वृद्ध ने सहानुभूति के स्वर में पूछा, “क्रिस, कहाँ जाओगी?”

क्रिस्टाबेल ने बिना किसी की ओर देखे ही उत्तर दिया, “यांगसिन, सेनापति से रिपोर्ट करने।”

“कैसी रिपोर्ट?”

“वह कायर है, कायर!” कहते-कहते क्रिस्टाबेल ने घोड़े को एड़ दी और बात-की-बात में बहुत दूर निकल गयी। जब वह बिलकुल ओझल हो गयी, तब लोगों की भाव-तरंगिनी को निकलने की राह मिली, एक ही गगन-कम्पी हुंकार में – “क्रिस्टाबेल की जय!”

5

जिस समय सैनिकों का दल मार्टिन को बन्दी करने आया और किवाड़ बन्द पाकर खटकाने लगा, तब मार्टिन अपनी बन्दूक लेकर सामने आया और ललकार कर बोला, “क्या है?” किन्तु कहते-कहते उसने देखा, सैनिकों के साथ क्रिस्टाबेल भी है। उसे देखकर मार्टिन ने बन्दूक आकाश की ओर करके दाग दी और फिर ज़मीन पर पटक दी। बदले हुए स्वर में फिर पूछा, “क्या है?”

“हम तुम्हें बन्दी करने आये हैं – प्रजातन्त्र के नाम पर।”

“किस अपराध के लिए?”

“कायरता के लिए।”

“मुझे?” कहकर मार्टिन ने एक बार फिर क्रिस्टाबेल की ओर देखा; पर उसने आँख नहीं मिलायी। मार्टिन बोला, “मैं तैयार हूँ, चलो! मैंने हथियार डाल दिये हैं।”

सैनिकों ने उसे बीच में ले लिया। उनके नायक ने क्रिस्टाबेल से पूछा, “आप कहाँ जाएँगी, हमारे साथ ही?”

“नहीं, तुम जाओ। मुझे अपना काम है।”

सैनिक बन्दी को लेकर आगे बढ़ने लगे। जब वे कुछ दूर चले गये, तब क्रिस्टाबेल एक हल्की-सी चीख मारकर कीच में ही बैठ गयी, “मार्टिन! मार्टिन!”

पता नहीं, बन्दी ने उसे सुना कि नहीं। उसके मुख का भाव ज़रा भी नहीं बदला। शायद सैनिकों के पद-रव में वह डूब गयी थी, वह करुण पुकार – “मार्टिन!”

6

“प्रहरी!”

“क्या है?”

“एक बात सुनोगे?”

“अगर प्रजातन्त्र के खिलाफ नहीं होगी, तो सुन लूँगा।”

“तो ज़रा पास सरक आओ।”

पहरेदार बन्दी के पास आ गया। बन्दी ने कहा – “जानते हो, कल मेरा कोर्ट मार्शल होना है?”

“हाँ, जानता हूँ।”

“शायद – अवश्य – प्राणदंड की आज्ञा होगी।”

“हाँ, यही सम्भावना है।”

“मेरा एक पत्र पहुँचा दोगे?”

“किसे?”

“स्त्री-सेना की एक वालंटियर को।”

“वह तुम्हारी कौन है?”

मार्टिन ने इसका उत्तर नहीं दिया। बोला – “मुझे अब फिर किसी से मिलने या बोलने का अवसर नहीं मिलेगा, इसी से कहता हूँ।”

पहरेदार ने कुछ सोच कर कहा – “काम तो सहज नहीं है। और फिर-“

“और क्या?”

“मैं तुम्हारी सहायता क्यों करूँ? तुम तो-“

“कह दो न, रुक क्यों गये?”

पहरेदार फिर चुप हो रहा। यह देखकर मार्टिन स्वयं ही बोला – “मैं कायर हूँ, देश का शत्रु हूँ, यही न?”

पहरेदार ने बिना कुछ कहे सिर झुका लिया। उसकी यह अर्द्ध-व्यक्त स्वीकृति देखकर मार्टिन बोला, “मेरे पास इसका उत्तर नहीं है। तुम्हें क्या कहूँ? अगर कहता हूँ कि मैं कायर नहीं हूँ, तो तुम अपने मन में सोचोगे, सभी कायर ऐसा कहा करते हैं। इसलिए इतना ही कहूँगा, मैं मनुष्य हूँ, मेरे हृदय है और अभिमान भी।”

मार्टिन थोड़ी देर प्रहरी की ओर चुपचाप देखता रहा। फिर बोला – “ले जाओगे?”

प्रहरी ने धीरे से कहा – “हाँ, ड्यूटी बदलने से पहले दे देना।”

“मैंने लिख रखा है। अभी ले लो, कोई नहीं देख रहा है।”

यह कहकर मार्टिन ने शीघ्रता से एक छोटा-सा पुर्जा सिपाही की ओर बढ़ा दिया। सिपाही ने उसे अपनी बन्दूक की नली में डाल लिया और बोला, “मैंने तुम्हारा विश्वास किया है – देखना।”

मार्टिन ने उत्तर नहीं दिया, एक बार उसकी ओर देख-भर दिया। उस दृष्टि में न-जाने क्या था, उसे लक्ष्य कर प्रहरी चुपचाप सिर झुकाये इधर-उधर घूमने लगा।

मार्टिन कोठरी के मध्य में जाकर बैठ गया और छत के एक छोटे-से रोशनदान की ओर देखने लगा। एक बार चौंक कर बोला – “हैं? यह मैंने क्या किया?” फिर थोड़ी देर के लिए चुप हो गया। फिर एक लम्बी साँस लेकर बोला – ‘विराट् प्रेम का अन्त भी विराट् होना चाहिए। मैं उसे अपनी व्यथा क्यों दिखाऊँ?’

मार्टिन ऐसी प्रश्न-भरी मुद्रा से उस रोशनदान की ओर देखने लगा, मानो उसी से उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हो।

7

मार्टिन के विशाल भवन के चारों ओर सैनिकों का पहरा था; किन्तु सैनिक प्रजातन्त्र के नहीं थे। मकान के अन्दर से गाने की ध्वनि आ रही थी; किन्तु वे प्रजातन्त्र के राष्ट्र-गीत के स्वर नहीं थे। मार्टिन के भवन पर आज शत्रु-सेना का अधिकार था, आज देश के सात सौ शत्रु उसमें आश्रय पा रहे थे और अधिकाधिक दक्षिण की ओर बढ़ने के मनसूबे बाँध रहे थे।

और भवन के बाहर चारों ओर पतली कीच थी – काली-काली, केवल कहीं कहीं भवन से आने वाले प्रकाश के कारण दीप्त…

भवन से दूर पर छोटे-छोटे पेड़ों के झुरमुट में क्रिस्टाबेल खड़ी थी। उसके पास ही एक पेड़ से घोड़ा बँधा था। क्रिस्टाबेल एकाग्र दृष्टि से भवन की ओर देख रही थी; किन्तु ध्यान से देखने पर मालूम हो जाता था कि उसकी आँखें उधर लगी होने पर भी ध्यान उधर नहीं था।

भवन के अन्दर शायद कोई उत्सव हो रहा था – और इसीलिए कभी-कभी शायद अग्नि की उद्दीप्ति के कारण उसके अन्दर प्रकाश बढ़ जाता था। उसी प्रकाश की एक-आध झलक रात्रि के अन्धकार को भेद कर उस झुरमुट तक पहुँच जाती थी तो उसमें क्रिस्टाबेल का वह तना हुआ चेहरा और चमकती हुई आँखें – आँसू-भरी आँखें-स्पष्ट दीख जाती थीं।

क्रिस्टाबेल ने आप-ही-आप कहा, “आज दंड हो चुका होगा… और कल मैं…”

रुक कर वह फिर उस ससंज्ञ तन्द्रा में पड़ गयी।

“मार्टिन… मेरा दुर्भाग्य…”

एकाएक मानो किसी दृढ़ निश्चय से प्रेरित होकर उसने अपने शरीर को झटका दिया और भवन पर से आँखें हटा लीं। किन्तु तत्काल ही उसका शरीर जड़ हो गया, मानो कोई चिड़िया साँप की सम्मोहन दृष्टि से निकलने का व्यर्थ प्रयत्न करके थक गयी हो।

वह फिर भवन की ओर देखने लगी।

“ईसा, ईसा, अगर उसके दिल में इतना साहस होता – अगर मेरे हाथों में इतनी शक्ति…”

एकाएक वह चौंकी। घोड़े ने भी चौंक कर सिर उठाया और हवा सूँघने लगा।

क्रिस्टाबेल ने देखा, उसके आगे कुछ दूर पर एक आदमी धीरे-धीरे, चौकन्ना होकर, बढ़ रहा है। एकाएक वह एक स्थान पर रुका और ज़मीन टटोल कर बैठ गया। फिर उसने जेब में से एक चकमक पत्थर का टुकड़ा निकाल कर थोड़ी-सी घास सुलगायी और उसे भूमि पर रख दिया।

भूमि पर से धुआँ उठने लगा। थोड़ी देर बाद थोड़ा-सा ‘छर्र-छर्र-’ हुआ, जैसे बारूद जली हो, और उसके क्षणभंगुर प्रकाश में क्रिस्टाबेल ने देखा, वह व्यक्ति मार्टिन का चिर-परिचित था। उसके मुख पर एक विचित्र आनन्दमिश्रित विजय का भाव था।

क्रिस्टाबेल ने धीरे से पुकारा, “साइमन!”

वह व्यक्ति चौंका। उसने जेब से पिस्तौल निकाला और पेड़ों से झुरमुट की ओर बढ़ा। जब वह पास आ गया, तब फिर क्रिस्टाबेल बोली, “साइमन, मैं हूँ, क्रिस्टाबेल।”

उस व्यक्ति ने पिस्तौल छिपा लिया और बोला, “तुम यहाँ कहाँ?”

“और तुम?”

“मैं कार्यवश आया था।”

“क्या कर रहे थे?”

“ज़रा देर ठहरो, अभी जान जाओगी।” कह कर वह रुका और चुपचाप भवन की ओर देखने लगा। क्रिस्टाबेल भी उधर देखती रही।

एकाएक क्रिस्टाबेल को प्रतीत हुआ, भूकम्प हो रहा है, उसके पैर लड़खड़ाये घोड़ा भी एकाएक हिनहिनाया, वातावरण में मानो एकाएक घोर दबाव-सा पड़ा-क्रिस्टाबेल ने आँखें बन्द कर लीं-

धड़ाक्-धम्म!

एकाएक बीसियों तोपों का-सा स्वर हुआ। क्रिस्टाबेल का सिर भन्ना गया, कान बहरे हो गये। एक मिनट तक वह कुछ कह नहीं सकी। फिर उच्च ज्वर में बोली, “यह क्या है?” प्रश्न व्यर्थ था। धमाके से मार्टिन का विशाल भवन एकाएक भूतल से उड़ गया था और उसके छिन्न-भिन्न अवशेष न जाने कहाँ-कहाँ फैल गये थे। दो-चार टुकड़े उस झुरमुट से कुछ ही दूर पर गिरे थे।

यही सब देखकर साइमन ने क्रिस्टाबेल को उत्तर नहीं दिया। बोला, “मैं तुम्हारी तलाश में था।”

“क्यों?”

“एक पत्र है? मार्टिन का।”

“ऐं? तुमने कैसे पाया?”

“उसने किसी प्रहरी के हाथ भिजवाया था, वह मुझे दे गया।”

क्रिस्टाबेल ने प्रश्न-भरी दृष्टि से उसकी ओर देखा, कुछ बोली नहीं। साइमन ने उसका अभिप्राय समझकर कहा, “उसको प्राणदंड की आज्ञा हो गयी।”

क्रिस्टाबेल सिर झुकाकर खड़ी रही। साइमन ने पत्र उसकी ओर बढ़ाया। उसने ले लिया। साइमन ने दिया सलाई जलाकर प्रकाश किया, क्रिस्टाबेल पत्र पढ़ने लगी।

पत्र पढ़कर जब उसने साइमन की ओर देखा, तब भी तिरस्कार और विद्रूप का भाव उसकी आँखों से गया नहीं था। उसने पूछा, “अच्छा, यह बताओ, यह प्रबन्ध तुमने कब किया था?”

“यह प्रबन्ध मेरा नहीं, मार्टिन का था।”

“हैं?”

“वह कूमिङतांग की गुप्त कार्यकारिणी का सदस्य था। उसने बन्दी होने से पहले मुझे कहा था कि इस पलीते में आग लगा जाऊँ। मैं कल भी आया था; पर कल यह गीला था, जला नहीं।”

क्रिस्टाबेल के मुख से एक शब्द भी नहीं निकला। वह बिजली से ताड़ित लता की तरह ज़मीन पर पड़ गयी।

मिनट-भर बाद जब उसे होश आया, तब रोते स्वर में बोली, “तुमने पहले नहीं कहा? अगर मैं जानती – कल तक भी जानती होती…”

इसके आगे उसका स्वर रोने के आवेग में अस्पष्ट हो गया।

साइमन ने हिचकिचाते हुए स्वर में कहा, “बहिन, धैर्य धरो-“

क्रिस्टाबेल बिजली की तरह उठी और घोड़े की लगाम पेड़ से खोलकर सवार हो ली। साइमन ने पूछा, “कहाँ चलीं?”

क्रिस्टाबेल ने कोई उत्तर नहीं दिया, हाथ का पत्र साइमन की ओर फेंक कर घोड़ा दौड़ाती हुई निकल गयी।

जब साइमन का विस्मय कुछ कम हुआ, तब वह फिर दियासलाई जलाकर पत्र पढ़ने लगा-

‘क्रिस्टाबेल, कल मुझे प्राणदंड हो जाएगा, इसलिए आज अन्तिम विदा ले रहा हूँ। हमारा विच्छेद तो उसी दिन हो गया था, जिस दिन तुम्हारा विश्वास उठ गया, किन्तु अभ्यासवश विदा माँग रहा हूँ।

‘सुनो, क्रिस्टाबेल, जाते हुए एक बात कहे जाता हूँ। मैं कायर नहीं हूँ, इस बात का विश्वास मैं तुम्हें उसी समय दिला सकता था; पर तुम विश्वास नहीं कर सकी। मुझे तुमसे विश्वास की -सहज, स्वाभाविक, अटल विश्वास की – आशा थी। यह आशा प्रत्येक मनुष्य करता है। तुम वैसा विश्वास नहीं दे सकीं। अगर प्रत्येक बात में विश्वास का पात्र होने के लिए प्रमाण देना पड़े, अगर तुम्हारा प्रेम प्राप्त करने के लिए नित्य ही यह दिखाना पड़े कि मैं उसका पात्र हूँ, तो ऐसे प्रेम का क्या मूल्य है? अगर तुम विश्वास-भर कर लेती!

‘दो-एक दिन में मैं नहीं रहूँगा। तब तक या उसके बाद – तुम्हें ‘प्रमाण’ मिल जाएँगे कि मैं कायर नहीं हूँ। इसीलिए मैं कहता हूँ, अगर तुम अब किसी से प्रेम करो, तो ऐसा व्यक्ति चुनना, जिसका तुम अकारण विश्वास कर सको। एक कायर से इतनी ही शिक्षा ग्रहण कर लो!

‘अब मेरे हृदय में शान्ति है! अपना हृदय टटोल कर देख लेना, उसमें क्या है। – मार्ट’

पत्र पढ़ चुकने पर साइमन ने एक लम्बी साँस ली और धीरे-धीरे एक ओर को चल दिया।

8

“अरे, तुम सबको क्या हो गया? कहाँ पागलों की तरह भागे जा रहे हो?”

“तुम्हें नहीं मालूम? एक कायर को प्राणदंड मिल रहा है।”

“मार्टिन को? उसका फैसला हो गया?”

“कल ही।”

“क्या? उसने कोई सफ़ाई नहीं दी?”

“नहीं। जब उससे पूछा गया, तब बोला, ‘मैं सैनिक हूँ। सैनिक स्वभावतः विश्वास का पात्र होता है। मैं सफ़ाई देकर विश्वास मोल नहीं लेना चाहता’।”

“इतनी अकड़? मालूम होता है, कायर के भी कुछ दिल है।”

“अरे, अभी और सुनो! जब दंड सुनाया गया, तब जजों ने उस क्रिस्टाबेल की तारीफ़ भी की। इन दोनों की शादी होने वाली थी। तब मार्टिन बोला, ‘हाँ’ मेरी ओर से बधाई भिजवा दीजिएगा।”

“फिर?”

फिर बोला, ‘आपने मुझे कहा है और प्राणदंड दिया है। प्रजातन्त्र के एक सैनिक की हैसियत से मैं दंड स्वीकार करता हूँ। पर एक प्रार्थना है कि दंड देते समय मुझे कायर की तरह पीठ में गोली न मारी जाय! मैं कायर नहीं हूँ!’

“फिर?”

“जज ने पूछा, ‘इसका सबूत?’ पर बेचारा सबूत क्या देता? चुप हो गया। जज ने बहुत सोचकर कहा, ‘मैं विवश हूँ।’ फिर क़ैदी को ले गये।”

भीड़ को चीरता हुआ एक घोड़ा आगे आ रहा था, इन दोनों व्यक्तियों के पीछे पीछे चल रहा था। उस पर सवार एक स्त्री इस चेष्टा में थी कि मौक़ा मिलने पर आगे निकल जाय। ये बातें सुनकर वह व्यथित, अर्ध-विक्षिप्त स्वर में बोली, “अरे, यह सब मैं सुन चुकी हूँ – फिर क्यों दोहराते हो? बताओ, दंड होने में कितनी देर है?”

दोनों व्यक्ति चुपचाप एक ओर हट गये और उसकी और देखने लगे। उसने अपना प्रश्न दोहराया।

“पन्द्रह-बीस मिनट होंगे-“

“बस?” कहकर क्रिस्टाबेल ने घोड़े को चाबुक मारा। चाबुक से अनभ्यस्त, थके-माँदे किन्तु अभिमानी घोड़े ने सिर उठाकर फुँफकारा और फिर तिलमिला कर भीड़ को चीरता हुआ दौड़ने लगा। किसको धक्का लगता है, कौन गिरता है, अपने अपमान में वह सब भूल गया।

दोनों व्यक्तियों ने एक-दूसरे की ओर देखकर कहा, “पूरी दानवी है!” और फिर आगे बढ़ने लगे।

9

उस चौक के आसपास तीनों ओर खचाखच भीड़ भरी हुई थी। चौथी ओर, दीवार की छाया में, एक शहतीर ज़मीन में गड़ा हुआ खड़ा था, जिसके साथ सैनिक मार्टिन को बाँध रहे थे। उसे शहतीर के साथ सटाकर, मुँह दीवार की ओर करके खड़ा कर दिया गया था। मार्टिन चुपचाप निष्क्रिय होकर देखता जाता था, मानो वह इस अभिनय का प्रधान पात्र न होकर एक दर्शक मात्र हो।

भीड़ इस क्रिया को देखती जाती थी और आलोचना करती जाती थी, “कैसा मरियल-सा खड़ा है – जैसे अफ़ीम खा ली हो!”

“अरे, कायर को हौसला थोड़े ही होता है?”

“कल तो बड़ी शान से खड़ा था – जज को भी घुड़की देता था!”

“अरे, जब तक मौत सिर पर नहीं आती, तब तक गीदड़ भी घुड़कियाँ दिखाते हैं। पता तो तब चलता है, जब सामना होता है।”

भीड़ की आलोचना सदा बड़ी पैनी और विषाक्त होती है, पर मार्टिन पर उसका तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ा। शायद इसी से आलोचना प्रखरतर होती जा रही थी।

थोड़ी ही देर में बाँधने की क्रिया पूरी हो गयी। सैनिक वहाँ से हट गये।

इस शहतीर के पचास क़दम की दूरी पर सैनिकों की एक क़तार खड़ी थी और उनसे कुछ हटकर एक सैनिक अफ़सर, जिसके आदेशानुसार सब काम हो रहा था। उसने एक बार चारों ओर देखा और उसने भीड़ के एक अंश को पीछे हटने का इशारा किया, फिर सावधान होकर सैनिक-पंक्ति को आदेश देने लगा।

उसके आदेशों से प्रेरित सैनिकों ने बन्दूकों के कुन्दे अपने कन्धों पर टेके, निशाने साधे और तैयार होकर खड़े हो गये।

अफ़सर अपनी घड़ी देखने लगा।

एकाएक चौक से दूर पर पक्की सड़क पर घोड़े की टाप-सरपट दौड़ की टाप-सुनाई पड़ी।

किसी ने कहा, “वह क़ैदी का क्षमा-पत्र आ रहा होगा।”

तत्काल ही किसी ने फटकार दिया “चुप रहो!”

भीड़ को चीरता हुआ एक घोड़ा निकला और सवार स्त्री ने एकाएक लगाम खींची। घोड़ा अफ़सर के बिलकुल पास आकर रुका। स्त्री क्षण-भर मुग्धवत देखती रही। भीड़ ने उसकी ओर देखा और एक ही स्वर में-दबे स्वर में-बोली, “दानवी!”

अफ़सर ने घड़ी से आँख हटाते हुए कहा, “एम! (निशाना साधो!)”

क्रिस्टाबेल चौंकी और लड़खड़ाते हुए घोड़े पर से कूदकर अफ़सर की ओर दौड़ी।

अफ़सर ने दृढ़ स्वर में कहा – “फ़ायर! (दागो!)”

लोगों की आँखें क्रिस्टाबेल से हटकर मार्टिन पर जा जमीं-

उस क्षणिक, गम्भीर औत्सुक्यपूर्ण प्रकम्पित महाशान्ति में एक स्त्री-स्वर गूँज उठा, “उसे बचाओ – अकलंक! अकलंक!”

फिर एकाएक बाहर बन्दूकों के नाद में वह स्वर डूब गया – क्रिस्टाबेल लड़खड़ाने लगी -सैनिक मार्टिन की ओर दौड़े – किसी ने कहा, “वह देखो!”

लोगों ने देखा, जिन रस्सियों में मार्टिन बाँधा गया था, वे टूट गयी थीं। मार्टिन दीवार की ओर पैर किये औंधे मुँह पड़ा था। भीड़ को एकाएक मानो खोई हुई वाणी मिल गयी।

“यह कब हुआ?”

“उसकी चीख सुनकर ही। मैं देख रहा था, वह चौंका, फिर झटका देकर घूम गया।”

“मैंने भी देखा था। वह खुद भी चिल्लाया था-“

“क्या?”

“क्राइस्ट!”

“नहीं, ‘क्रिस्टाबेल!”

“हाँ-हाँ, ‘क्रिस्टाबेल ही!”

सैनिकों ने जब आकर मार्टिन के शव को उठाया, तब उनके मुँह पर आदर का भाव था। एक ने कहा, “यह देखो, सभी गोलियाँ छाती में लगी हैं।”

लोग मार्टिन के शव को देखने और उसकी आलोचना करने में इतने लीन हो गये कि बेचारी क्रिस्टाबेल – हाथ में प्रजातन्त्र की मोहरवाला एक कागज़ लिये खड़ी क्रिस्टाबेल – की ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया। वह एक बड़ी लम्बी, बड़ी थकी हुई, बड़ी उत्सर्गपूर्ण-सी साँस लेकर गिरते-गिरते बोली, “अकलंक!”

(दिल्ली जेल, सितम्बर 1931)
अज्ञेय रचनावली खंड : 3
अज्ञेय संपूर्ण कहानियाँ / Agyeya Ki Hindi Kahaniyaan || RED PAPERS
संपादन – कृष्णदत्त पालीवाल

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