इस्तीफ़ा — मुंशी प्रेमचंद

1 दफ्तर का बाबू एक बेजबान जीव है। मजदूरों को ऑंखें दिखाओ, तो वह त्योरियॉँ बदल कर खड़ा हो जायकाह। कुली को एक डाँट बताओं, तो सिर से बोझ फेंक …

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कप्तान साहब — मुंशी प्रेमचंद

1 जगत सिंह को स्कूल जान कुनैन खाने या मछली का तेल पीने से कम अप्रिय न था। वह सैलानी, आवारा, घुमक्कड़ युवक थां कभी अमरूद के बागों की ओर …

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प्रायश्चित — मुंशी प्रेमचंद

1 दफ्तर में जरा देर से आना अफसरों की शान है। जितना ही बड़ा अधिकारी होता है, उत्तरी ही देर में आता है; और उतने ही सबेरे जाता भी है। …

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मंत्र-1 — मुंशी प्रेमचंद

1 संध्या का समय था। डाक्टर चड्ढा गोल्फ खेलने के लिए तैयार हो रहे थे। मोटर द्वार के सामने खड़ी थी कि दो कहार एक डोली लिये आते दिखायी दिये। …

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ममता — मुंशी प्रेमचंद

1 बाबू रामरक्षादास दिल्ली के एक ऐश्वर्यशाली खत्री थे, बहुत ही ठाठ-बाट से रहनेवाले। बड़े-बड़े अमीर उनके यहाँ नित्य आते-आते थे। वे आये हुओं का आदर-सत्कार ऐसे अच्छे ढंग से …

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ईश्वरीय न्याय — मुंशी प्रेमचंद

1 कानपुर जिले में पंडित भृगुदत्त नामक एक बड़े जमींदार थे। मुंशी सत्यनारायण उनके कारिंदा थे। वह बड़े स्वामिभक्त और सच्चरित्र मनुष्य थे। लाखों रुपये की तहसील और हजारों मन …

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एक्ट्रेस — मुंशी प्रेमचंद

1 रंगमंच का परदा गिर गया। तारा देवी ने शकुंतला का पार्ट खेलकर दर्शकों को मुग्ध कर दिया था। जिस वक्त वह शकुंतला के रुप में राजा दुष्यन्त के सम्मुख …

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आत्म-संगीत — मुंशी प्रेमचंद

1 आधी रात थी। नदी का किनारा था। आकाश के तारे स्थिर थे और नदी में उनका प्रतिबिम्ब लहरों के साथ चंचल। एक स्वर्गीय संगीत की मनोहर और जीवनदायिनी, प्राण-पोषिणी …

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सोहाग का शव — मुंशी प्रेमचंद

1 मध्यप्रदेश के एक पहाड़ी गाँव में एक छोटे-से घर की छत पर एक युवक मानो संध्या की निस्तब्धता में लीन बैठा था। सामने चन्द्रमा के मलिन प्रकाश में ऊदी …

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पिसनहारी का कुआं — मुंशी प्रेमचंद

गोमती ने मृत्यु-शय्या पर पड़े हुए चौधरी विनायकसिंह से कहा — “चौधरी, मेरे जीवन की यही लालसा थी।” चौधरी ने गम्भीर हो कर कहा — “इसकी कुछ चिंता न करो …

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